Wednesday, 8 February 2012

साझा - संगीत


सांझ होते ही
कुछ सुलगने लगता है
और चुल्हा जलते ही
बुझ भी जाता है
इन सब के दर्मियान
तुम्हारी चुड़ियों से
उठती खन खन खनक
रचती है
"राग ललित"
जो मेरे होठों तक आते आते
"भैरवी" हो जाती है .....
                                   ( भारतेंदु कश्यप )

Saturday, 4 February 2012

गुज़रा है बसंत....


हमने सुना है
इस गली से गुज़रा है बसंत
गाँव के नुक्कड़ से ही मुड़ गया
मुँह चिढ़ाता हुआ
अंगूठा दिखाता हुआ
पीली सरसों को
झुकी हुई अमराइयों को
महुआ से टपकते रसों को
तीसी के बैगनी फूलों को


वह बढ़ गया
नियॉन बल्बों की रोशनी में
क्लबों मे जा बैठा है ...
इस शहर की  
तमाम सपाट
      बेजान सड़कों से
हो के गुज़रा है ....
चढ़ा है किसी उंची अट्टालिका पे
देखने को
कि
इस साल
दलहन
तिलहन
आम
आदि आदि की
कहाँ –कहाँ
अच्छी पैदावार होने वाली है ....


हमने सुना है
इधर से गुज़रा है बसंत
हमारे खेत खलिहान
     बाग – बगीचे
     ताल – तलैया
पार करता हुआ
ठेंगा दिखाता हुआ
इस गली से गुज़रा है बसंत ......
                                ( भारतेंदु कश्यप  )

Friday, 23 December 2011

बाल मन....


एक छोटी सी कविता
और
पूरा आसमान तान लिया है
एक काग़ज़ की तरह ....
सातो समंदर मे घोल दी है
स्याही ....
छोटे से बच्चे की तरह
पालथी मार कर बैठ गया हूँ
काग़ज़ पर ...
लपक के डूबाता हूँ
कलम समंदर मे ....
शुरु करता हूँ
लिखना
छोटी सी कविता ....
पहले ही
अक्षर से
सिकुड़ने लगता है आसमान
सूखने लगते हैं समंदर ....
पूरी होने लगती है कविता
आकार लेने लगता है मेरा
बाल-मन ................


Monday, 5 December 2011

चिट्ठियाँ ....एक अवशेष


चिट्ठियाँ
1
चिट्ठी
जब आती थी
तो अपने  साथ
केवल संदेश नहीँ
और भी बहुत कुछ ले आती थी
ले आती थी
रिश्ते
लिखने वाले के हाथोँ की गर्मी
उसका खूलूस
उसकी हँसी
उसकी रुलाई
काले काले अक्षरोँ के बीच
इन सबके साथ
बसी रहती थी सुबुक सी हवा
बसती थी उसमे गंध
माटी की ...
अभी भी है
मेरी आलमारी मे वो गंध
               वो हवा
क्योँकि कुछ चिट्ठियाँ हैं वहाँ
और ये सब बचे रहेंगे  
तब तक
जब तक
ये  कुछ चिट्ठियाँ बची  हैँ ...


2 .
“ अत्र कुशलँ तत्रास्तु ”
“ सर्व श्री उपमयोग ” 
“ ख़ैरियत के बाद दीगर अहवाल ”
ये सम्बोधन सारे
कहाँ चले गये ?
जो किसी भी आगत विगत
को इस तरह बयाँ करते थे
कि
एक ताक़त मिल जाती थी
उनका सामना करने की
अब तो जो भी है
वो बोल के आता है
हमे बिना कोई मौका दिये ...
झनझनाते हुए तारोँ पर सवार हो कर ....

3
युनिवर्सिटी का आख़िरी दिन
फेअर-वेल पार्टी के बाद
ग्रुप फोटोग्राफ
सब एक दूसरे के पते
अपनी डायरियोँ पे लिख रहे थे ...
कहते जा रहे थे डबड्बायी आँखो से
“ चिट्ठियाँ लिखना दोस्त ”
                                   भारतेंदु कश्यप.....




Tuesday, 29 November 2011

सांझ -दिन


सांझ सिंदूरी हो गयी
तो लगा
तुमने अपनी मांग भरी हो ...
अक्सर ये सांझ
तुम जैसी लगती है
और चढ़ता हुआ दिन
मुझ जैसा आवारा ....
जो भटक – भुटुक कर लौटेगा
तुम्हारी सिंदूरी ड्योढ़ी पर
और तुम
चुनरी धीरे धीरे खींच कर
एक गहरी छाया कर दोगी ...
                                                   ( भारतेंदु कश्यप )

Saturday, 26 November 2011

सुनाने जैसा कुछ ....


“ हम आज़ाद हैं ”
“ आज़ाद देश के नागरिक हैं ”
.
.
.
.
या और भी ऐसे ही मिलते जुलते वाक्य विन्यास
एक सपना हैं ?
या फिर
रेत की घड़ी उल्टी घूम चुकी है ?
दो लोगों ने हाथ मिलाया
जिसमे
एक हाथ हमारे ही देश की नुमाइंदगी कर रहा है
दूसरा इस हाथ इस दुनिया के  एक धन कुबेर का
और इधर मेरे खेतिहर दादा जी के हाथो में छाले फूट पड़े  !
( जो फसल के पकते पकते सूख जाते थे 
बिना किसी बेटाडीन के )
नहर से आता पानी
आधे रास्ते में ही रुक गया !
छीटी जा रही खाद
भाप बन के उड़ गयी !
जबकि उसे गिरना था खेत में
खड़ी फसलों पर ....

बच्चों की किताबों से
कुछ मासूम
कुछ ऐतिहासिक
कुछ रोमांटिक
अफ़साने गायब हो गए !
रह गए हैं
चक्र – वृध्दि व्याज के सूत्र
जो अभी से
किसी सूदखोर की वीभत्स सी हंसी की तरह खड़े हैं
और ऐसा लग रहा है
कि
उनके हाथ में एक छड़ी है
और किसी भी वक्त
दरवाज़े पर टंगे परदे को पीटना शुरू करेंगे ....
और फिर से
ये “ परदा ” फटेगा .....
( परदा – श्री यशपाल की चर्चित कहानी )
                                                                      भारतेंदु कश्यप ......
 ( प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह द्वारा वाल मार्ट कंपनी के देश में आने का निमंत्रण देने पर )




Thursday, 24 November 2011

सपने


कच्ची नीद के
पक्के सपने ...
थोड़े पराये
ज़्यादा अपने ...
मन के सड़क पर, टूटी गड़ारी
उसपे  सब बैठे हैं बारी बारी ...
चिकनी मिट्टी से लीप पोत कर
खड़ा किया जो  महल अटारी ...
कब जायेंगे
उसमे बसने ....
कच्ची नीद के ....

कैसी धूप और कैसी छांव
दौड़ते रहते थे नंगे पाँव
मन से रचते थे नदी रेत में  
उसमे चलती चांदी की नाँव
कैसी हवा
लगी है बहने ...
कच्ची नीद के ....

मामा कहकर रोज़ रात को
चाँद को अपनी छत पे बुलाते
सोने के कटोरे में दूध भात ले
थोड़ा खाते ज़्यादा खिलाते
अब वो भी लगे हैं
कट कट के रहने ....
कच्ची नीद के ....

खेत- डहर तक बिखरे सपने
संसद में हैं अब बिकते  सपने
जल्दी ही कस कर बाजु अपने
करेंगे खुद ही हिसाब ये सपने
क्योंकि सांस
लगी है घुटने .....
कच्ची नीद के
पक्के सपने ....
                                           भारतेंदु कश्यप .......