“ हम आज़ाद हैं ”
“ आज़ाद देश के नागरिक हैं ”
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या और भी ऐसे ही मिलते जुलते वाक्य विन्यास
एक सपना हैं ?
या फिर
रेत की घड़ी उल्टी घूम चुकी है ?
दो लोगों ने हाथ मिलाया
जिसमे
एक हाथ हमारे ही देश की नुमाइंदगी कर रहा है
दूसरा इस हाथ इस दुनिया के एक धन कुबेर का
और इधर मेरे खेतिहर दादा जी के हाथो में छाले फूट पड़े !
( जो फसल के पकते पकते सूख जाते थे
बिना किसी बेटाडीन के )
( जो फसल के पकते पकते सूख जाते थे
बिना किसी बेटाडीन के )
नहर से आता पानी
आधे रास्ते में ही रुक गया !
छीटी जा रही खाद
भाप बन के उड़ गयी !
जबकि उसे गिरना था खेत में
खड़ी फसलों पर ....
बच्चों की किताबों से
कुछ मासूम
कुछ ऐतिहासिक
कुछ रोमांटिक
अफ़साने गायब हो गए !
रह गए हैं
चक्र – वृध्दि व्याज के सूत्र
जो अभी से
किसी सूदखोर की वीभत्स सी हंसी की तरह खड़े हैं
और ऐसा लग रहा है
कि
उनके हाथ में एक छड़ी है
और किसी भी वक्त
दरवाज़े पर टंगे परदे को पीटना शुरू करेंगे ....
और फिर से
ये “ परदा ” फटेगा .....
( परदा – श्री यशपाल की चर्चित कहानी )
भारतेंदु कश्यप ......
( प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह द्वारा वाल मार्ट कंपनी के देश में आने का निमंत्रण देने पर )
बहुत अच्छी कविता है.. बहुत गहराई के साथ लिखी है आपने...काश वो लोग सोच पाते जिन्हें देश और समाज के बारे में सबसे ज्यादा सोचना चाहिए..
ReplyDeletekya baat hai bhai ji... bahut khoob
ReplyDeletehai.... sahi kah rahe ho...
ReplyDeleteअलफ़ाज़ किसी तीर से कम नहीं होते.....बस निशाना सही होना..
ReplyDeleteबहुत अच्छा लिखा है दादा