Tuesday, 29 November 2011

सांझ -दिन


सांझ सिंदूरी हो गयी
तो लगा
तुमने अपनी मांग भरी हो ...
अक्सर ये सांझ
तुम जैसी लगती है
और चढ़ता हुआ दिन
मुझ जैसा आवारा ....
जो भटक – भुटुक कर लौटेगा
तुम्हारी सिंदूरी ड्योढ़ी पर
और तुम
चुनरी धीरे धीरे खींच कर
एक गहरी छाया कर दोगी ...
                                                   ( भारतेंदु कश्यप )

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