Friday, 23 December 2011

बाल मन....


एक छोटी सी कविता
और
पूरा आसमान तान लिया है
एक काग़ज़ की तरह ....
सातो समंदर मे घोल दी है
स्याही ....
छोटे से बच्चे की तरह
पालथी मार कर बैठ गया हूँ
काग़ज़ पर ...
लपक के डूबाता हूँ
कलम समंदर मे ....
शुरु करता हूँ
लिखना
छोटी सी कविता ....
पहले ही
अक्षर से
सिकुड़ने लगता है आसमान
सूखने लगते हैं समंदर ....
पूरी होने लगती है कविता
आकार लेने लगता है मेरा
बाल-मन ................


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