Thursday, 24 November 2011

सपने


कच्ची नीद के
पक्के सपने ...
थोड़े पराये
ज़्यादा अपने ...
मन के सड़क पर, टूटी गड़ारी
उसपे  सब बैठे हैं बारी बारी ...
चिकनी मिट्टी से लीप पोत कर
खड़ा किया जो  महल अटारी ...
कब जायेंगे
उसमे बसने ....
कच्ची नीद के ....

कैसी धूप और कैसी छांव
दौड़ते रहते थे नंगे पाँव
मन से रचते थे नदी रेत में  
उसमे चलती चांदी की नाँव
कैसी हवा
लगी है बहने ...
कच्ची नीद के ....

मामा कहकर रोज़ रात को
चाँद को अपनी छत पे बुलाते
सोने के कटोरे में दूध भात ले
थोड़ा खाते ज़्यादा खिलाते
अब वो भी लगे हैं
कट कट के रहने ....
कच्ची नीद के ....

खेत- डहर तक बिखरे सपने
संसद में हैं अब बिकते  सपने
जल्दी ही कस कर बाजु अपने
करेंगे खुद ही हिसाब ये सपने
क्योंकि सांस
लगी है घुटने .....
कच्ची नीद के
पक्के सपने ....
                                           भारतेंदु कश्यप .......








4 comments:

  1. सपनों का बेहतरीन वर्णन ... दिल को छू लिया इस कविता ने :)

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  2. सच्चे...थे ये अच्छे सपने....
    बेहतरीन है.....

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  3. Ek khushbu lagti hai ye meri,iisme bahut apna pan hai mere khyal se har padne wala shayad yahi mahsus karega..

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