Tuesday, 22 November 2011

डग भर ज़मीन ...

डग भर ज़मीन ,
बित्ते भर आसमान ,
अंजुरी भर नदी ,
कमा के लौटा है परदेसी ……

पांव में आलता
माथे पे ईंगुर
होठों पे लाली
पूरे बदन पे लगाके  उबटन
उतारी है मैल एक अरसे की
धनिया ने .....
कडुवे तेल में छानी है पूड़ी
पकाया है गुड़ का मीठा भात
सीझा है मरुसे की सालन
              परोसा जतन से
              खिलाया लगन से
कसने लगी है बसहटे की ओन्चन
जो अरसे से ढीली पड़ी थी
आज वह अकेली नहीं है
जो जैसे तैसे गुड़ीमुड़ीं सो जाए
बिछावन पे दो निखरे बदन !!!
कहीं बांस टूटा ?
कहीं ओन्चन चटकी ?

डग भर ज़मीन पे
 बड़ी मुश्किल से डाला बसहटा...
अंजुरी भर नदी
समंदर में अदहन हुई ...
बित्ते भर आस्मान  की चादर से
चार पांव बाहर रहे .....
पर
जो रात काटे ना कटती थी
वो चुटकी में यूं कट गयी

धनिया फिर से लीप रही है चौका
गीली मिट्टी से .....
गीले चौके को सूंघती है बार बार
फडक उठते हैं उसके नथुने ...
खिल उठती है कोख उसकी .....
               परदेसी तैयार है फिर से
               कमाने को
               डग भर ज़मीन
               बित्ते भर आसमान
               अंजुरी भर नदी .........

4 comments:

  1. bht masarat hui aap esi tarah lekhte rahe yahi duwa hai mari khuda se

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  2. ye muflesi bhi ajeeb hoti hai bhi jan jo aap ke lafzo se us insan ko bya kar rah hai....................

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  3. ...in kavitaon ke gird ek ajeeb si khushboo phaile hai, jise ek arsa pahle mai kahin chor aaya tha....ye kavita nahi ek khushboo hai jo abhi abhi kisi gaon se Bombay aaye hai, is sahar me mai iska SWAGAT karta hu....

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