Tuesday, 29 November 2011

सांझ -दिन


सांझ सिंदूरी हो गयी
तो लगा
तुमने अपनी मांग भरी हो ...
अक्सर ये सांझ
तुम जैसी लगती है
और चढ़ता हुआ दिन
मुझ जैसा आवारा ....
जो भटक – भुटुक कर लौटेगा
तुम्हारी सिंदूरी ड्योढ़ी पर
और तुम
चुनरी धीरे धीरे खींच कर
एक गहरी छाया कर दोगी ...
                                                   ( भारतेंदु कश्यप )

Saturday, 26 November 2011

सुनाने जैसा कुछ ....


“ हम आज़ाद हैं ”
“ आज़ाद देश के नागरिक हैं ”
.
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या और भी ऐसे ही मिलते जुलते वाक्य विन्यास
एक सपना हैं ?
या फिर
रेत की घड़ी उल्टी घूम चुकी है ?
दो लोगों ने हाथ मिलाया
जिसमे
एक हाथ हमारे ही देश की नुमाइंदगी कर रहा है
दूसरा इस हाथ इस दुनिया के  एक धन कुबेर का
और इधर मेरे खेतिहर दादा जी के हाथो में छाले फूट पड़े  !
( जो फसल के पकते पकते सूख जाते थे 
बिना किसी बेटाडीन के )
नहर से आता पानी
आधे रास्ते में ही रुक गया !
छीटी जा रही खाद
भाप बन के उड़ गयी !
जबकि उसे गिरना था खेत में
खड़ी फसलों पर ....

बच्चों की किताबों से
कुछ मासूम
कुछ ऐतिहासिक
कुछ रोमांटिक
अफ़साने गायब हो गए !
रह गए हैं
चक्र – वृध्दि व्याज के सूत्र
जो अभी से
किसी सूदखोर की वीभत्स सी हंसी की तरह खड़े हैं
और ऐसा लग रहा है
कि
उनके हाथ में एक छड़ी है
और किसी भी वक्त
दरवाज़े पर टंगे परदे को पीटना शुरू करेंगे ....
और फिर से
ये “ परदा ” फटेगा .....
( परदा – श्री यशपाल की चर्चित कहानी )
                                                                      भारतेंदु कश्यप ......
 ( प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह द्वारा वाल मार्ट कंपनी के देश में आने का निमंत्रण देने पर )




Thursday, 24 November 2011

सपने


कच्ची नीद के
पक्के सपने ...
थोड़े पराये
ज़्यादा अपने ...
मन के सड़क पर, टूटी गड़ारी
उसपे  सब बैठे हैं बारी बारी ...
चिकनी मिट्टी से लीप पोत कर
खड़ा किया जो  महल अटारी ...
कब जायेंगे
उसमे बसने ....
कच्ची नीद के ....

कैसी धूप और कैसी छांव
दौड़ते रहते थे नंगे पाँव
मन से रचते थे नदी रेत में  
उसमे चलती चांदी की नाँव
कैसी हवा
लगी है बहने ...
कच्ची नीद के ....

मामा कहकर रोज़ रात को
चाँद को अपनी छत पे बुलाते
सोने के कटोरे में दूध भात ले
थोड़ा खाते ज़्यादा खिलाते
अब वो भी लगे हैं
कट कट के रहने ....
कच्ची नीद के ....

खेत- डहर तक बिखरे सपने
संसद में हैं अब बिकते  सपने
जल्दी ही कस कर बाजु अपने
करेंगे खुद ही हिसाब ये सपने
क्योंकि सांस
लगी है घुटने .....
कच्ची नीद के
पक्के सपने ....
                                           भारतेंदु कश्यप .......








Tuesday, 22 November 2011

डग भर ज़मीन ...

डग भर ज़मीन ,
बित्ते भर आसमान ,
अंजुरी भर नदी ,
कमा के लौटा है परदेसी ……

पांव में आलता
माथे पे ईंगुर
होठों पे लाली
पूरे बदन पे लगाके  उबटन
उतारी है मैल एक अरसे की
धनिया ने .....
कडुवे तेल में छानी है पूड़ी
पकाया है गुड़ का मीठा भात
सीझा है मरुसे की सालन
              परोसा जतन से
              खिलाया लगन से
कसने लगी है बसहटे की ओन्चन
जो अरसे से ढीली पड़ी थी
आज वह अकेली नहीं है
जो जैसे तैसे गुड़ीमुड़ीं सो जाए
बिछावन पे दो निखरे बदन !!!
कहीं बांस टूटा ?
कहीं ओन्चन चटकी ?

डग भर ज़मीन पे
 बड़ी मुश्किल से डाला बसहटा...
अंजुरी भर नदी
समंदर में अदहन हुई ...
बित्ते भर आस्मान  की चादर से
चार पांव बाहर रहे .....
पर
जो रात काटे ना कटती थी
वो चुटकी में यूं कट गयी

धनिया फिर से लीप रही है चौका
गीली मिट्टी से .....
गीले चौके को सूंघती है बार बार
फडक उठते हैं उसके नथुने ...
खिल उठती है कोख उसकी .....
               परदेसी तैयार है फिर से
               कमाने को
               डग भर ज़मीन
               बित्ते भर आसमान
               अंजुरी भर नदी .........