चिट्ठियाँ
1
चिट्ठी
जब आती थी
तो अपने साथ
केवल संदेश नहीँ
और भी बहुत कुछ ले आती थी
ले आती थी
रिश्ते
लिखने वाले के हाथोँ की गर्मी
उसका खूलूस
उसकी हँसी
उसकी रुलाई
काले काले अक्षरोँ के बीच
इन सबके साथ
बसी रहती थी सुबुक सी हवा
बसती थी उसमे गंध
माटी की ...
अभी भी है
मेरी आलमारी मे वो गंध
वो हवा
क्योँकि कुछ चिट्ठियाँ हैं वहाँ
और ये सब बचे रहेंगे
तब तक
जब तक
ये कुछ चिट्ठियाँ बची हैँ ...
2 .
“ अत्र कुशलँ तत्रास्तु ”
“ सर्व श्री उपमयोग ”
“ ख़ैरियत के बाद दीगर अहवाल ”
ये सम्बोधन सारे
कहाँ चले गये ?
जो किसी भी आगत विगत
को इस तरह बयाँ करते थे
कि
एक ताक़त मिल जाती थी
उनका सामना करने की
अब तो जो भी है
वो बोल के आता है
हमे बिना कोई मौका दिये ...
झनझनाते हुए तारोँ पर सवार हो कर ....
3
युनिवर्सिटी का आख़िरी दिन
फेअर-वेल पार्टी के बाद
ग्रुप फोटोग्राफ
सब एक दूसरे के पते
अपनी डायरियोँ पे लिख रहे थे ...
कहते जा रहे थे डबड्बायी आँखो से
“ चिट्ठियाँ लिखना दोस्त ”
भारतेंदु कश्यप.....