Saturday, 28 July 2012


लखनऊ को याद करते हुए ( बहाना कोई और है )


चुप चाप दसतक़ दे रही है
एक कहानी
एक नज़्म
एक गीत
और कई नाटक 
जो कभी तेरे मेरे साथ लिखे थे ....
हज़रत गंज से मुंशी पुलिया तक
और वापस
मुंशी पुलिया से हज़रत गंज तक ....
जिसमे सिमटी हुई है
अमीनाबाद की शाम ...
सिमटे हुए हैं
चीनी मिट्टी के बर्तन 
कांच की प्यालियां
और चिकनकारी के लिबास
जिनको खरीदने के ख़्वाब बुने थे ...
आज फिर से
वही ख्वाब दस्तक दे रहे हैं
आधी रात को
मेरे ज़ेहन के दरवाज़े पे ...
कच्चे रसीले स्वाद के साथ
भीनी भीनी महक लिये
लब-ए-माशूक़ की तरह ...
मुम्बई से चलती हैं कई रेलगाड़ियां
लेकिन जो केवल लखनऊ जंक्शन तक छोड़ देती हैं मुझे ....
वहाँ की गलियों का रास्ता बताने के लिये
आ जा ...
आ जा मेरे दोस्त ....
लखनऊ की सर्दीली शाम आज भी मेरे मन मे ताज़ा है ...
हज़रत गंज के चाय की गर्मी लिये ...
                                                    
( दोस्तों .... याद आ रही है तुम्हारी .. ) 
                                                                       भारतेंदु कश्यप