हमने सुना है
इस गली से गुज़रा है बसंत
गाँव के नुक्कड़ से ही मुड़ गया
मुँह चिढ़ाता हुआ
अंगूठा दिखाता हुआ
पीली सरसों को
झुकी हुई अमराइयों को
महुआ से टपकते रसों को
तीसी के बैगनी फूलों को
वह बढ़ गया
नियॉन बल्बों की रोशनी में
क्लबों मे जा बैठा है ...
इस शहर की
तमाम सपाट
बेजान सड़कों से
हो के गुज़रा है ....
चढ़ा है किसी उंची अट्टालिका पे
देखने को
कि
इस साल
दलहन
तिलहन
आम
आदि आदि की
कहाँ –कहाँ
अच्छी पैदावार होने वाली है ....
हमने सुना है
इधर से गुज़रा है बसंत
हमारे खेत खलिहान
बाग – बगीचे
ताल – तलैया
पार करता हुआ
ठेंगा दिखाता हुआ
इस गली से गुज़रा है बसंत ......
( भारतेंदु कश्यप )